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मलबे में तब्दील होते ख्वाब

मल्होत्रा हवेली का पिछला हिस्सा, जहाँ कभी पुराने सामान रखे जाते थे, अब आन्या का नया ठिकाना था। खिड़की से आती ठंडी हवा और धूल भरे फर्श ने उसे अहसास दिला दिया था कि उसकी दुनिया रातों-रात बदल चुकी है।

"खड़ी क्यों हो? ये झाड़ू उठाओ और पूरा आंगन साफ करो!" एक नौकरानी ने चिल्लाकर कहा। कबीर के सख्त आदेश थे कि आन्या को इस घर में एक अपराधी की तरह रखा जाए।

आन्या ने कांपते हाथों से झाड़ू उठाई। उसकी आंखों से आंसू गिर रहे थे, लेकिन जुबां खामोश थी। उसे बस एक ही उम्मीद थी—उसके पिता। उसे यकीन था कि उसके पापा उसे यहाँ से ले जाएंगे।

पिता की बेबसी

तभी हवेली के भारी दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से पीटने की आवाज़ आई। आन्या दौड़कर बाहर निकली। सामने उसके पिता, मिस्टर सहगल, खड़े थे। उनके बाल बिखरे हुए थे और चेहरा पीला पड़ गया था।

"आन्या! मेरी बच्ची!" उन्होंने चिल्लाया।

"पापा!" आन्या भागकर उनके गले लगना चाहती थी, लेकिन कबीर बीच में आ खड़ा हुआ। उसके चेहरे पर एक क्रूर मुस्कान थी।

"मिस्टर सहगल, आप यहाँ? मैंने तो सुना था कि आपकी कंपनी के शेयर आज ज़मीन पर गिर गए हैं। आपके पास तो अब वकील की फीस भरने के भी पैसे नहीं बचे होंगे," कबीर ने ज़हर उगलते हुए कहा।

"कबीर बेटा, ये तुम क्या कर रहे हो? मेरी बेटी बेगुनाह है! उसने किसी की जान नहीं ली," मिस्टर सहगल गिड़गिड़ाए।

"बेगुनाह?" कबीर ने आन्या का हाथ झटके से पकड़ा और उसे अपने पिता के सामने घसीटा। "इसने मेरी दादी की जान बचाने वाली लड़की को मार डाला! और अब, मैं इसे और इसके पूरे खानदान को एक-एक पैसे के लिए तरसा दूँगा।"

आखिरी मुलाकात

कबीर ने गार्ड्स को इशारा किया और उन्होंने मिस्टर सहगल को धक्के देकर बाहर निकाल दिया। आन्या ज़मीन पर गिरकर रोने लगी।

"पापा! मत जाइए! कबीर जी, प्लीज उन्हें मत मारिए!"

"उन्हें मैं नहीं मारूँगा आन्या, उन्हें उनकी अपनी गरीबी मारेगी," कबीर ने ठंडे स्वर में कहा और अंदर चला गया।

उस रात, आन्या को खाना नहीं दिया गया। वह पूरी रात स्टोर रूम की ठंडी ज़मीन पर बैठी रही। सुबह के चार बजे थे जब उसके पुराने फोन (जो उसने छिपाकर रखा था) पर एक मैसेज आया। वह उसकी मां का था।

> "आन्या... तुम्हारे पापा अब नहीं रहे। उन्होंने कल रात पंखे से लटककर अपनी जान दे दी। बैंक वाले घर आ रहे हैं, हमें सड़क पर निकाल दिया गया है। मुझे माफ कर देना बेटी..."

>

आन्या के हाथ से फोन छूट गया। उसके कानों में सन्नाटा छा गया। उसे लगा जैसे उसके दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गए हों। चीखना चाहती थी, पर गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी।

तबाही का मंजर

आन्या बदहवास हालत में कबीर के बेडरूम की तरफ भागी। उसने दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया।

"कबीर! दरवाज़ा खोलिए! मेरे पापा मर गए! आपकी वजह से उन्होंने जान दे दी!"

कबीर ने दरवाज़ा खोला। उसकी आंखों में एक पल के लिए चौंकने के भाव आए, लेकिन फिर उसने खुद को सख्त कर लिया। "नाटक बंद करो आन्या। ये सहानुभूति पाने का पुराना तरीका है।"

"ये नाटक नहीं है! देखिए!" उसने फोन कबीर की तरफ फेंका।

कबीर ने मैसेज पढ़ा। उसके दिल में एक पल के लिए कसक उठी, लेकिन तभी उसे माया का चेहरा याद आया—वह मासूम लड़की जिसे उसने (उसके हिसाब से) मरते देखा था। उसने फोन वापस फेंक दिया।

"शायद उन्होंने अपनी बेटी के गुनाहों का बोझ सहने के बजाय मरना बेहतर समझा। इसमें मेरा क्या दोष?"

आन्या ने कबीर को ऐसे देखा जैसे वह कोई इंसान नहीं, बल्कि पत्थर हो। "आज आपने एक बेगुनाह बाप का कत्ल किया है कबीर मल्होत्रा। याद रखना, जिस दिन आपको सच पता चलेगा, आप भी मौत की दुआ मांगेंगे, पर मौत आपको नसीब नहीं होगी।"

कबीर ने उसका चेहरा ज़ोर से भींचा। "मैं सच जानता हूँ। और अब तुम्हारी मां की बारी है। अगर चाहती हो कि वह ज़िंदा रहे, तो कल से मेरे ऑफिस में एक मामूली सफाई कर्मचारी की तरह काम करना शुरू करोगी। मैं तुम्हारी रूह को कुचलना चाहता हूँ।"

आन्या की आंखों में अब आंसू सूख चुके थे। वहां सिर्फ एक जलती हुई आग थी।

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