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एक मसीहा और एक साया

शहर की हलचल से दूर, पहाड़ी रास्ते पर एक आलीशान कार तेज़ी से गुज़र रही थी। कार की पिछली सीट पर शारदा देवी (कबीर की दादी) बैठी थीं। अचानक, उनकी छाती में एक तेज़ दर्द उठा—एक ऐसा दर्द जिसने उनकी सांसें रोक दीं। ड्राइवर घबरा गया और हड़बड़ाहट में कार एक पेड़ से जा टकराई।

धुआं उठ रहा था, और शारदा देवी अधमरी हालत में कार के बाहर गिरने की कोशिश कर रही थीं। सुनसान सड़क पर दूर-दूर तक कोई नहीं था।

तभी, पास के मंदिर की सीढ़ियों से उतरती आन्या की नज़र उस दुर्घटना पर पड़ी। वह बिना सोचे-समझे कार की तरफ भागी।

"दादीजी! आप ठीक हैं?" आन्या की आवाज़ में सच्ची फिक्र थी।

उसने बड़ी मशक्कत से शारदा देवी को कार से बाहर निकाला। शारदा देवी की सांसें उखड़ रही थीं। आन्या ने अपनी प्राथमिक चिकित्सा (First Aid) की जानकारी का इस्तेमाल किया, उन्हें CPR दिया और अपने दुपट्टे से उनके सिर का घाव बांधा।

"घबराइए मत, मैं आपको कुछ नहीं होने दूंगी," आन्या ने हौसला दिया और तुरंत एम्बुलेंस को फोन किया।

शारदा देवी ने धुंधली आँखों से उस लड़की को देखा। आन्या का चेहरा किसी फरिश्ते जैसा लग रहा था। उन्होंने आन्या के हाथ पर बंधा एक खास लाल धागा और चांदी का कंगन देख लिया, जो उनकी पहचान बन गया। एम्बुलेंस आने की आवाज़ सुनते ही, आन्या ने देखा कि एक और लड़की वहां दौड़ती हुई आ रही है। वह आन्या की सहेली माया थी।

"आन्या! क्या हुआ ये?" माया ने हांफते हुए पूछा।

"माया, शुक्र है तुम आ गई! एम्बुलेंस आ गई है, तुम इन्हें संभालो। मेरे फोन पर पापा की बहुत सारी मिस्ड कॉल्स हैं, उन्हें अस्पताल ले जाना होगा, मैं घर निकलती हूँ। पुलिस केस और पूछताछ हुई तो पापा बहुत परेशान हो जाएंगे," आन्या ने जल्दबाजी में कहा। वह नहीं चाहती थी कि उसके घरवाले उसकी सुरक्षा को लेकर डरें।

आन्या वहां से चली गई, लेकिन उसने यह नहीं देखा कि माया की आँखों में मदद की भावना नहीं, बल्कि लालच की चमक थी।

हॉस्पिटल,

दो घंटे बाद, शहर के सबसे बड़े अस्पताल के बाहर काली गाड़ियों का एक काफिला रुका। कबीर मल्होत्रा अपनी चिर-परिचित गंभीरता और गुस्से के साथ कार से उतरा। उसकी दादी उसकी कमज़ोरी थीं।

अंदर पहुँचते ही उसने देखा कि एक लड़की उसकी दादी के बिस्तर के पास बैठी है।

"डॉक्टर! मेरी दादी कैसी हैं?" कबीर की दहाड़ गूंजी।

डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा, "वह ठीक हैं मिस्टर कबीर। शुक्र मनाइए इस लड़की का, अगर इसने सही समय पर CPR न दिया होता और पट्टी न बांधी होती, तो हम उन्हें बचा नहीं पाते।"

कबीर की नज़र माया पर पड़ी। माया ने तुरंत अपनी आँखों में नकली आँसू भर लिए।

"मैंने बस अपना फर्ज निभाया कबीर जी," माया ने बेहद मासूमियत से कहा। "जब मैंने इन्हें सड़क पर तड़पते देखा, तो मुझसे रहा नहीं गया।"

दादी अभी होश में नहीं थीं, इसलिए वे सच नहीं बता सकीं। कबीर ने माया के हाथ पकड़ लिए, "आज तुमने मुझ पर जो एहसान किया है, उसका बदला मैं कभी नहीं चुका पाऊंगा। तुम जो चाहोगी, तुम्हें मिलेगा।"

माया ने मन ही मन मुस्कुराते हुए सोचा— मुझे तो आप और आपकी दौलत चाहिए, कबीर।

हफ़्तों बाद: दादी की ज़िद

शारदा देवी को होश आया, तो उन्होंने सबसे पहले उस लड़की के बारे में पूछा जिसने उनकी जान बचाई थी।

"कबीर, वह लड़की... जिसने मुझे बचाया, वही मेरे घर की बहू बनेगी," दादी ने ज़िद की।

कबीर ने मुस्कुराकर कहा, "दादी, मैं भी यही चाहता हूँ। माया वाकई बहुत अच्छी लड़की है।"

दादी चौंक गईं। "माया? नहीं कबीर, उसका नाम आन्या था... शायद।"

"नहीं दादी, वह माया ही थी। वह आपके पास ही तो बैठी थी जब मुझे होश आया," कबीर ने उन्हें समझाया। दादी को अपनी याददाश्त पर थोड़ा शक हुआ, क्योंकि चोट की वजह से उनका दिमाग अभी भी भारी था।

लेकिन कुछ दिनों बाद, जब दादी ने आन्या को एक सामाजिक समारोह में देखा, तो उन्होंने पहचान लिया। उन्होंने कबीर से कहा, "ये है वो लड़की, आन्या! इसने मेरी जान बचाई थी।"

कबीर ने आन्या की तरफ देखा। आन्या अपनी सादगी में बहुत खूबसूरत लग रही थी। पर तभी माया उसके पास आई और कबीर को इशारा किया।

माया ने पहले ही कबीर के कान भर दिए थे— "कबीर, आन्या बहुत लालची है। उस दिन एम्बुलेंस में उसने मुझसे कहा था कि काश उसने दादी को बचाया होता तो वह आपसे करोड़ों रुपये मांगती। वह बहुत खतरनाक लड़की है।"

कबीर की आँखों में आन्या के लिए नफरत उतर आई। उसने सोचा— दादी इस लड़की की मासूमियत के झांसे में आ गई हैं। ठीक है, मैं इस 'लालची' लड़की से शादी करूँगा, लेकिन इसे प्यार नहीं, नर्क का अहसास कराऊंगा।

                    

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